विधानसभा चुनाव की हलचल तेज हो गयी है. एनडीए और महागठबंधन के घटक दलों के बीच सीटों की हिस्सेदारी पर होमवर्क चल है. इस होमवर्क के अनेक सतह हैं. ऊपरी परत पर सब कुछ सामान्य दिखता है. पर जैसे-जैसे परत हटाते जाएंगे,उसके ताप महसूस होने शुरू हो जाते हैं. ऐसा दोनों गठबंधनों में है.

एनडीए और महागठबंधन के घटक दलों में सीटों की दावेदारी पर रस्साकशी है. अक्तूबर के अंत और नवंबर महीने में होने वाले चुनाव के परिणाम चाहे जैसा भी हो, इतना तय माना जा रहा कि सीटों के बंटवारे में 2020 में जो फार्मूला अपनाया गया था, कमोबेश वही फार्मूला इस बार भी अपनाया जायेगा.


एनडीए में इस बार दो नयी पार्टियों की इंट्री हुई है. पहला चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास) और दूसरा उपेंद्र कुशवाहा की रालोमो. ये दोनों पार्टियां 2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए से अलग होकर चुनाव मैदान में गयी थीं.


वहीं पिछली दफा एनडीए में आखिरी वक्त में आयी मुकेश सहनी की वीआइपी इस बार महागठबंधन का अंग है. महागठबंधन में भी सीटों को लेकर जोर आजमाइश है. कांग्रेस और वामदलों ने सीटों को लेकर अघोषित दवाब बना रखा है. बावजूद इसके एनडीए और महागठबंधन दोनों में पूर्व के अनुपात में ही सीटों का बंटना तय माना जा रहा है.एनडीए में जदयू और भाजपा कमोबेश बराबर की भूमिका में होगी और कुछ सीटों से जदयू इस बार भी बड़े भाई की भूमिका में होगा.


वहीं महागठबंधन में राजद को सबसे अधिक सीटें मिलेंगी और दूसरे नंबर पर कांग्रेस होगी. एनडीए के भीतर जदयू और भाजपा के इतर चिराग पासवान की पार्टी लोजपा (रामविलास) की महत्वाकांक्षाएं काफी तेज है. ज्यादा सीटों की कामना केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हम और पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा की रालोमो को भी है. चिराग पासवान की पार्टी ने इसके लिए पूर्व के चुनावों का हवाला देते हुए कहा कि वह पहली बार जदयू के साथ मिल कर चुनाव मैदान में जाने वाले हैं. पार्टी ने इशारों ही इशारों में सीटों की संख्या पर अपनी दावेदारी भी जता दी है.








































































































































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