पश्चिम मध्य रेलवे के जबलपुर मंडल के कटनी स्टेशन में मानव तस्करी के शक में ट्रेन से उतारे गए 165 बच्चों को 12 दिनों की लंबी जांच के बाद सभी बच्चों को सुरक्षित उनके घर वापस भेज दिया गया है.

यह निर्णय जांच के बाद लिया गया कि यह मामला तस्करी का नहीं, बल्कि मदरसे की शिक्षा से जुड़ा था. बिहार के अररिया और सुपौल से महाराष्ट्र जा रहे इन बच्चों को पुलिस ने रेस्क्यू ऑपरेशन के तहत रोका था.


उस वक्त पुलिस इसे मानव तस्करी का बड़ा मामला बता रही थी और 8 शिक्षकों पर केस भी दर्ज किया गया था, लेकिन सामाजिक जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि बच्चे केवल पढ़ाई के लिए मदरसा जा रहे थे. जीआरपी थाना प्रभारी जीएल कश्यप ने भी पुष्टि की है कि अब तक की जांच में मानव तस्करी जैसा कुछ भी सामने नहीं आया है.



इस कार्रवाई के दौरान पुलिस ने जिस तरह का बर्ताव किया, उसे लेकर अब कानूनी सवाल खड़े हो रहे हैं. कानून (जेजे एक्ट 2016) के मुताबिक, बच्चों को संरक्षण में लेते समय पुलिस अधिकारी का वर्दी में होना मना है. उन्हें सादे कपड़ों में होना चाहिए, ताकि बच्चे डरे नहीं. लेकिन कटनी में पुलिसकर्मी वर्दी में बच्चों की घेराबंदी करते नजर आए.


नियमों के अनुसार हर थाने में एक बाल कल्याण पुलिस अधिकारी होना चाहिए, जो बच्चों से संवेदनशीलता से पेश आए. मगर आरोप है कि यहां बच्चों के साथ अपराधियों जैसा बर्ताव किया गया.

















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