1951 में रिलीज हुई राज कपूर की फिल्म आवारा ने भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा दी। यह फिल्म न सिर्फ एक भावनात्मक कहानी कहती है, बल्कि समाज के कई गहरे सवालों को भी उठाती है। आज जब हम इस क्लासिक को फिर से देखते हैं, तो यह समझना जरूरी है कि आवारा क्यों सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक विचार है।

फिल्म की शुरुआत होती है डिस्ट्रिक्ट जज रघुनाथ (पृथ्वीराज कपूर) से, जो अपनी गर्भवती पत्नी लीला (लीला चिटनिस) पर शक करते हैं कि उनका बच्चा किसी अपराधी जग्गा का है। यह बच्चा है राज (राज कपूर), जो गरीबी में पलता है। राज की मुलाकात स्कूल में रीता (नरगिस) से होती है, लेकिन वो ज़्यादा टिकती नहीं राज को स्कूल से निकाल दिया जाता है रीता भी दूसरे शहर चली जाती है बचपन में ही दोनों बिछड़ जाते हैं।

फिर सालों बाद कहानी एकदम घूमती है। किस्मत का खेल देखिए रीता एक पढ़ी-लिखी वकील बनने की तैयारी कर रही है स्वतंत्र और दूसरी तरफ राज, अपराधी जग्गा के साथ रहकर बड़ा हुआ है और एक शातिर चोर बन चुका हैं। उनकी मुलाकात होती है तब जब राज लूट की गाड़ी चुराने का प्लान बनाता है और रीता का पर्स छीन लेता है। दोनों एक दूसरे को नहीं पहचानते लेकिन फिर भी एक खिंचाव महसूस करते हैं और प्यार में पड़ जाते हैं। राज बदलना चाहता है, लेकिन उसका अतीत पीछा नहीं छोड़ता। वह गुस्से में जग्गा का खून कर देता है।




























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