विज्ञानियों का मानना है कि कभी चंद्रमा पर भी जीवन रहा होगा। ऐसे में वहां क्या ऐसी घटना हुई, जिसके कारण जीवन समाप्त हो गया। क्या ऐसी ही कोई घटना पृथ्वी की सतह पर तो नहीं हो रही है, जिससे हजारों या लाखों वर्ष बाद यहां भी जीवन समाप्त हो जाएगा।

मिशन के दौरान प्राप्त होने वाले साइंटिफिक इनपुट दुनिया के विज्ञानियों को अंतरिक्ष के कई रहस्यों को सुलझाने में सहायता करते हैं। विज्ञानियों ने अपने रिसर्च में पाया है कि चंद्रमा धीरे-धीरे पृथ्वी की सतह से दूर जा रहा है। इसका अर्थ है कि या तो पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण कम हो रहा है या चांद का गुरुत्वाकर्षण बढ़ रहा है।

ऐसे में इसका धरती व यहां के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा इस पर रिसर्च की जरूरत है। हम जानते हैं चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण के कारण ही समुद्र में ज्वार भाटा आते हैं।

अगर चंद्रमा पृथ्वी से दूर जा रहा है तो यह ज्वार भाटा बनने का पैटर्न बदलेगा। बादल नहीं बनेंगे। बारिश नहीं होगी। सूखा व अकाल पड़ेगा। ऐसे में मानव जीवन की रक्षा और भविष्य के संकटों से बचाने के लिए मिशन चंद्रयान जैसे प्रोजेक्ट की जरूरत है।

अभी इसरो ने वहां जाने व सतह पर उतरने का प्रयोग किया है। वहां से वापस आने पर प्रयोग होना बाकी है। चंद्रमा की सतह पर उतरकर व्यक्ति वहां से मिट्टी के नमूने प्राप्त कर अपने साथ भारत लाएगा। यह चंद्रयान फोर प्रोजेक्ट है। इसे सैंपल रिटर्निंग मिशन का नाम दिया गया है।

इसरो के वरिष्ठ वैज्ञानिक और चंद्रयान टू व थ्री के ऑपरेशन डायरेक्टर अमिताभ कुमार ने कहा कि भारतीय को स्वदेशी अंतरिक्ष यान में बैठाकर चंद्रमा की सतह पर उतारने के लिए सरकार ने 2040 तक का समय निर्धारित किया है। इस अभियान में कई शृंखलाएं जुड़ी हैं।

इसरो ने डाकिंग व अनडाकिंग पर चार महीने में कार्य किया है। इस वर्ष की यह इसरो की उपलब्धि है। वे शनिवार को मुजफ्फरपुर में एक कार्यक्रम में पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि डाकिंग एक्सपेरिमेंट को अभी इसरो ने पृथ्वी की कक्षा में पूरा किया है।
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