वैशाली: टीबी की पहचान शुरुआती स्तर पर हो जाए और मरीज सरकारी अस्पताल के यक्ष्मा विभाग से परामर्श लेकर उपचार कराए तो यह बीमारी पूरी तरह से ठीक हो सकती है। लक्षण पहचाने में देरी और दवा बीच में छोड़ना मरीज को भारी पड़ता है। टीबी प्रिवलेंस सर्वे वर्ष 2019-2021 के मुताबिक टीबी के महज 60 फीसदी मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। 40 फीसदी को टीबी के लक्षण पता नहीं होते हैं। टीबी के लक्षण को न पहचानने और जागरूक नहीं रहने की वजह से वैशाली के ग्रामीण और शहरी के निवासी टीबी से प्रभावित हो रहे हैं। टीबी के लक्षण होने पर भी वह उन्हें पहचानने में देरी करते हैं, जिससे उनकी मुसीबतें और बढ़ जाती है। अभी जिला यक्ष्मा केंद्र से करीब चार हजार एक सौ 55 टीबी मरीज इलाजरत हैं।
हाजीपुर, पातेपुर और महुआ बना है हॉट स्पॉट:
जिला यक्ष्मा केंद्र के सीनियर डीपीएस राजीव कुमार ने बताया कि हाजीपुर में टीबी फर्स्ट लाइन के सबसे ज्यादा पेशेंट हाजीपुर यक्ष्मा केंद्र में रजिस्टर्ड हैं। जनवरी से अभी तक कुल नौ सौ टीबी मरीजों की खोज यहां हुई है। वहीं पातेपुर सेकंड लाइन यानी एमडीआर टीबी के लिए हॉट स्पॉट बना हुआ है। यहां जनवरी से अभी तक 12 एमडीआर के मरीजों की पहचान हुई है। इसके अलावे महुआ का कुछ क्षेत्र भी टीबी रोगियों के लिए हॉटस्पॉट बना हुआ है।
लक्षण पहचानने में देरी और माइग्रेशन भी एक वजह:
टीबी पर काम करने वाली संस्था रीच के जिला समन्वयक विकास चौरसिया ने कहा कि टीबी रोगियों की खोज में हम जिले में सभी जगह जाते हैं। बहुत सारे टीबी रोगियों से मिलते हैं, उनकी दवाओं की कोर्स पूरी करवाते हैं। टीबी होने के कारणों में सबसे मुख्य कारण जो स्पष्ट नजर आता है वह टीबी के लक्षणों को नजरअंदाज करना है। इसके अलावे पातेपुर प्रखंड में माइग्रेशन भी एक वजह है। जिसमें वह सुदूर राज्यों के कारखानों में मजदूरी करते हैं।
टीबी के लक्षण:
– दो सप्ताह अधिक की खांसी।
– खांसी के साथ बलगम का आना।
– शाम के समय बुखार आना ।
– भूख न लगना। लगातार वजन कम होना।
– रात को सोते समय पसीना आना।
– कभी-कभी बलगम के साथ खून आना।
Be First to Comment