उम्र के 95वें पड़ाव पर जहां लोग विश्राम चुनते हैं, वहीं विज्ञान और इंजीनियरिंग श्रेणी में पद्मश्री से सम्मानित प्रसिद्ध कृषि विज्ञानी डॉ. गोपालजी त्रिवेदी आज भी खेतों की मिट्टी और किसानों की प्रगति के लिए समर्पित हैं।

आधुनिक तकनीक और पारंपरिक ज्ञान के अद्भुत संगम से उन्होंने न केवल मुजफ्फरपुर की शाही लीची के पुराने बागों को पुनर्जीवित किया है, बल्कि जलजमाव वाले क्षेत्रों को ‘सोना’ उगाने वाली जमीन में बदल दिया है।

कैनोपी मैनेजमेंट: पुराने पेड़ों को मिला ‘नया जन्म’
मुजफ्फरपुर के करीब 12 हजार हेक्टेयर में फैले लीची के बागों में 40-50 साल पुराने पेड़ अब अनुत्पादक हो रहे थे। डॉ. त्रिवेदी ने वर्ष 2003 में ‘पुनर्जीवन कैनोपी मैनेजमेंट’ तकनीक पेश की।



इस तकनीक की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
छंटाई (Pruning): ऊंचे और घने पेड़ों को 1.5 मीटर की ऊंचाई तक छोटा किया जाता है।
प्रकाश और वायु: टहनियां कम होने से सूरज की रोशनी तने तक पहुंचती है, जिससे कीटों का प्रकोप घटता है।
पोषक तत्व: कटाई के बाद गोबर की खाद और सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग किया जाता है।



राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. विकास दास के अनुसार, इस तकनीक से बिहार में लगभग 5,000 हेक्टेयर बागों का कायाकल्प हुआ है। किसानों का अनुभव है कि जहां पहले 100 किलो फल मिलता था, अब वहां 115 किलो तक गुणवत्तापूर्ण उत्पादन हो रहा है।






















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