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“नीतीश, मांझी, चिराग के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ सकती भाजपा” ऐसा क्यों बोले प्रशांत किशोर, जानें…

पटना: बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार का गठन हुआ है। नीतीश की पार्टी जेडीयू से लेकर चिराग पासवान की लोजपा, मांझी की हम, उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएम, पशुपति पारस की आरएलजेपी एनडीए का हिस्सा है। जिसका नेतृत्व बीजेपी के हाथ में है। इस बीच जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बीजेपी की कमजोरी उजागर करते हुए कहा कि जितना देश में बीजेपी को लोग ताकतवर मानते हैं, उतना वो है नहीं। यही वजह है कि बिहार में वो हर किसी को अपने साथ लेकर चलना चाहती है। ताकि किसी तरह से किसी का नुकसान न हो।

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प्रशांत किशोर ने कहा जिस बीजेपी को आप लोग इतना ताकतवर समझते हैं। देश मानता है, अमित शाह को मोदी को। लेकिन अगर आप इन लोगों को गहराई से देखना और समझना चाहेंगे। तो पता चलेगा कि जहां पर इनके खिलाफ लोग या राजनीतिक दल मजबूती से चुनाव लड़े। और इनको हरा दिया, वहां पर कभी इनकी हिम्मत नहीं हुई। फिर से खड़ा होकर चुनाव लड़ने की। बिहार वो भूमि है, जहां 2015 में अमित शाह और मोदी को अपने सभी प्रयासों के बावजूद सफलता नहीं मिली। और वो जो डर है। वो इतना बड़ा डर है, हराने का जो आज तक कायम है।

पीके ने कहा कि जब आपको सब जगह पर आसान जीत मिलती है। और कहीं आप हार जाते हैं, तो आप डरते बहुत हैं। कहीं न कहीं बीजेपी की लीडरशिप को ये डर है कि बिहार की जो राजनीतिक पृष्टभूमि है, यहां की समाजवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि बीजेपी के लिए इतना आसान नहीं है कि मोदी के एक स्लोगन पर पूरे बिहार को जीत लिया जाए। ऐसा उनको लगता है। सच्चाई क्या है। ये तो वहीं जानें।

इसीलिए बीजेपी इस तरह के गठबंधन करती है। अभी हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने खुले मंच से इस बात का ऐलान किया था। कि अब नीतीश कुमार के लिए भाजपा के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो गए हैं। जो न चुनाव से पहले और बाद में खुलेंगे। वहीं अमित शाह जो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। हम 400 सीटें जीतेंगे।

ये बात बिहार का हर आदमी जानता है कि नीतीश कुमार का राजनीतिक वजूद अब बहुत मजबूत नहीं है। ये उनकी सियासत का अंतिम दौर है। अगर वो भी वापस आ रहे हैं। तब भी भाजपा को उनको स्वीकार करने में कोई दिकक्त नहीं है। इसकी वजह ये है कि बिहार की राजनीतिक भूमि को भाजपा इतना आसान मानती नहीं है। इसलिए हर किसी को साथ रखते हैं फिर चाहे वो मांझी हो, उपेंद्र कुशवाहा हो, चिराग पासवान हो। वो इसलिए कि कहीं 4-5 सीट का नुकसान न हो जाए।

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