बिहार की राजधानी पटना में दो महीने पहले ही बड़े शोर-शराबे और सियासी दावों के बीच उद्घाटन किए गए राज्य के पहले डबल डेक फ्लाईओवर का एक हिस्सा भारी बारिश के बीच धंस गया. इस फ्लाईओवर को ₹422 करोड़ की लागत से जामग्रस्त अशोक राजपथ की राहत के तौर पर प्रस्तुत किया गया था. लेकिन अब इसका एक हिस्सा धंसने से निर्माण की गुणवत्ता और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.

पटना में बीते दो दिनों से लगातार हो रही बारिश ने एक ओर जहां शहर की सड़कें डुबो दी हैं, वहीं दूसरी ओर विकास कार्यों की मजबूती की परतें भी उधेड़ दी हैं. राज्य के पहले डबल-डेकर फ्लाईओवर का एक हिस्सा रविवार को धंस गया, जिसका उद्घाटन 11 जून को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया था.यह फ्लाईओवर गांधी मैदान के पास कारगिल चौक से लेकर पीएमसीएच और साइंस कॉलेज तक बनाया गया था, ताकि व्यस्त अशोक राजपथ पर ट्रैफिक का दबाव कम किया जा सके. लेकिन बारिश के बाद फ्लाईओवर की सतह पर गड्ढा बन गया, जिससे आने-जाने वाले लोगों में दहशत फैल गई.



समाचार एजेंसी एएनआई द्वारा एक्स (पूर्व ट्विटर) पर शेयर किए गए वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि एलिवेटेड कॉरिडोर पर पानी जमा हो गया है और एक बड़ा हिस्सा धंस चुका है, जबकि उसी पर अब भी वाहन चल रहे हैं. वीडियो वायरल होते ही सोशल मीडिया पर लोगों ने कंस्ट्रक्शन क्वालिटी और सरकारी निगरानी प्रणाली को लेकर तीखे सवाल दागने शुरू कर दिए. पटना के कंकड़बाग, राजेंद्र नगर, एग्ज़िबिशन रोड और गांधी मैदान जैसे इलाकों में घरों, स्कूलों और अस्पतालों तक में पानी भर गया है. सड़कों पर जलभराव के कारण ट्रैफिक जाम, बीमार लोगों की आवाजाही और बच्चों की पढ़ाई सब ठप हो गई है.



यह पहली बार नहीं है जब बिहार में भारी भरकम बजट से तैयार कोई प्रोजेक्ट कुछ ही महीनों में सवालों के घेरे में आ गया हो. डबल डेक फ्लाईओवर को लेकर अब यह बहस छिड़ गई है कि क्या इसे जल्दबाज़ी में उद्घाटित किया गया था? क्या इसकी गुणवत्ता की ठीक से जांच हुई थी? और क्या जनता के टैक्स के पैसे का इस तरह इस्तेमाल जिम्मेदार शासन की मिसाल है?




बिहार में इस वक्त सवाल सिर्फ एक फ्लाईओवर के धंसने का नहीं, बल्कि विकास की नींव में कितनी सच्चाई है—इसका है. क्या ₹422 करोड़ की लागत पर बने फ्लाईओवर का दो महीने में ही इस तरह कमजोर हो जाना महज प्राकृतिक आपदा का असर है? या यह सिस्टम की एक बड़ी चूक है? जवाबदेही अब जरूरी है.
























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