हाल ही में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से अपील की है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी खाद्य तेल की खपत में कम से कम 10 प्रतिशत की कटौती करे। यदि खाद्य तेल की खपत में 10 प्रतिशत तक कमी आती है तो इससे आयात पर होने वाले खर्च को कुछ तो कम किया जा सकता है।

यदि हम खपत में केवल 10 प्रतिशत तक कटौती करने में सफल रहते हैं और उत्पादन में इतनी ही वृद्धि करते हैं तो इससे ना केवल बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा की बचत होगी, बल्कि किसानों को तिलहन फसलों के बेहतर दाम भी मिलेंगे। भारतीय रसोई की खाद्य तेल के बिना कल्पना भी नहीं की जा सकती।


वैसे तो पूरे विश्व में खाद्य तेल की सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति सालाना खपत चीन में होती है जबकि अमेरिका दूसरे और भारत तीसरे स्थान पर आता है। भारत में खाद्य तेल की प्रति व्यक्ति सालाना खपत 20 किलोग्राम से अधिक हो गई है जबकि स्वास्थ्य कारणों से विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा अनुशंसित 12 से 13 किलोग्राम से काफी अधिक है।

भारत में सन 1950 से 1960 के दशक में प्रति व्यक्ति तेल की खपत तीन किलोग्राम से भी कम थी। लेकिन हरित क्रांति के चलते तिलहन के उत्पादन में भी वृद्धि हुई जिसके कारण तेल की खपत भी बढ़ी है। बावजूद इसके घरेलू खपत की पूर्ति के लिये बड़ी मात्रा में खाद्य तेलों का आयात करना पड़ रहा है। हालांकि राष्ट्रीय खाद्य तेल-तिलहन मिशन (एनएमईओ-तिलहन घरेलू तिलहन फसलों के उत्पादन को बढ़ाने के साथ खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में प्रयास कर रहा है।

इस मिशन का उद्देश्य घरेलू तिलहन उत्पादन को 2030-31 तक 697 लाख मीट्रिक टन करना है। वर्तमान में, भारत अपनी खाद्य तेल आवश्यकताओं का 55 से 60 फीसदी हिस्सा इंडोनेशिया, मलेशिया, अर्जेंटीना, ब्राजील, रूस और यूक्रेन जैसे देशों से आयात करता है।

तिलहन उत्पादन में भारत विश्व में पांचवें स्थान पर है, किंतु लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण मांग एवं आपूर्ति का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है। इसलिए इस अंतर को कम करने के लिए तिलहन का उत्पादन बढ़ाना अतिआवश्यक है। लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है कि खपत को कम किया जाए। भारत खाद्य तेलों का विश्व में सबसे बड़ा आयातक देश है। वर्ष 2022-23 में 164.7 लाख टन तेल आयात किया गया, जिस पर 1.57 लाख करोड़ रुपये खर्च हुए थे।

































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