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केके पाठक का नया आदेश, अब शिक्षा विभाग को भेजनी होगी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों की हाजिरी खबर

पटना: बिहार के राजभवन और सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के साथ केके पाठक के विवाद के बीच शिक्षा विभाग ने नया फरमान जारी किया है। राज्य के विश्वविद्यालयों और अंगीभूत डिग्री कॉलेजों की हाजिरी की रिपोर्ट हर माह शिक्षा विभाग के पास आएगी। इसी आधार पर विभाग की ओर से सीधे विश्वविद्यालयों-कॉलेजों के शिक्षकों और शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के खाते में वेतन का भुगतान होगा।

The attendance of the degree colleges of the state will be sent to the  education department every month - राज्य के डिग्री कॉलेजों की हाजिरी हर माह  शिक्षा विभाग को जाएगी, Education
इस नयी व्यवस्था को लागू करने की विभाग की तैयारी अंतिम चरण में है। इस बाबत विभाग की ओर से हर विश्वविद्यालय और कॉलेज के प्राचार्यों को 25 और 27 मई को प्रशिक्षण दिया जाएगा। मालूम हो कि पूर्व से चली आ रही व्यवस्था के तहत शिक्षा विभाग सभी विश्वविद्यालयों को अनुदान राशि भेजता है। इसके बाद विश्वविद्यालय की ओर से अपने और उनके अधीनस्थ कॉलेज के शिक्षकों और शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के खाते में वेतन राशि का भुगतान किया जाता है।
इस व्यवस्था को विभाग ने बदलने का निर्णय लिया है। इसी आलोक में विभाग ने एक नया पोर्टल भी बनाया है, जिसके माध्यम से सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों का हर माह की हाजिरी की विवरणी विभाग को प्राप्त होगी। पोर्टल का उपयोग किस तरह से करना है, कौन-कौन सी जानकारी देनी है, इस तरह की जानकारी के लिए विश्वविद्यालयों के पदाधिकारियों और कॉलेज के प्राचार्यों को विभाग ने बुलाया है।

 

विश्वविद्यालयों और उसके अधीन कॉलेजों को वेतन भुगतान का माध्यमिक विभिन्न राज्यों में अलग-अलग है। झारखंड में राज्य सरकार संबंधित विश्वविद्यालयों को राशि देती है। इसके बाद विश्वविद्यालय के माध्यम से शिक्षकों-कर्मियों के खाते में वेतन राशि का भुगतान होता है। वहीं, उत्तर प्रदेश में शिक्षा विभाग के उच्च शिक्षा निदेशक के माध्यम में विश्वविद्यालयों-कॉलेजों के शिक्षकों और कर्मियों के खाते में सीधे वेतन भुगतान होता है।

पटना विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और शिक्षाविद डॉ.रासबिहारी सिंह ने कहा कि शिक्षा विभाग की ओर से सीधे विश्वविद्यालयों-कॉलेजों के शिक्षकों को वेतन-पेंशन की राशि का भुगतान करने की व्यवस्था लागू करना सुधार का कदम नहीं होगा। यह विश्वविद्यालयों की गरिमा को धूमिल करेगा और उसकी विश्वसनीयता को भी कमजोर करेगा। पूर्व से चली आ रही व्यवस्था ही बनी रहनी चाहिए। वहीं, विश्वविद्यालय प्रशासन को भी चाहिए कि वह वित्तीय मामलों में पूरी पारदर्शिता बरते। उपयोगिता प्रमाणपत्र समय पर विभाग को भेज दे।

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