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बिहार के इस गांव में बिखरी हैं इतिहास बताती पाल कालीन मूर्तियां, 1929 के सर्वे के बाद सो गया सिस्टम

जहानाबाद प्राचीन और मध्ययुगीन स्थल टीलों और खंडहरों से भरा पड़ा है। इनमें से कुछ में काफी महत्व के पुरातात्विक अवशेष मौजूद हैं। जिले में जिन विभिन्न स्थानों से पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए हैं, उनमें बराबर, धारावत और दबथू उल्लेखनीय स्थान पर हैं।

हिन्दुस्तान स्पेशलः बिहार के इस गांव में बिखरी हैं इतिहास बताती पाल कालीन मूर्तियां, 1929 के सर्वे के बाद सो गया सिस्टम

ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों की रक्षा कर इसे विकसित करने की भले ही समय-समय पर सरकार की ओर से घोषणा की जाती है लेकिन इस दिशा में कोई भी सार्थक कदम आज तक नहीं उठाया जा सका है। नतीजतन जिले के केउर, दावथू और घेजन गांव स्थित धरोहरों का अस्तित्व लुप्त होने की कगार पर है। संग्रहालय में संरक्षित करने के बजाए पाल कालीन बेशकीमती मूर्तियां इन स्थलों पर बिखरी पड़ी हैं, जिन पर तस्करों की नजर रहती है।

हुलासगंज प्रखंड मुख्यालय के पूरब एवं दक्षिणी छोर पर स्थित केउर गांव की गली, खेत और बधारों में अनगिनत मूर्तियां बिखरी पड़ी हैं। संरक्षण के अभाव में लगातार इनकी संख्या कम होती जा रही है। हालांकि  सरकार की ओर से इस दिशा में कोई पहल न होता देख ग्रामीणों ने मूर्तियों को बचाने का काफी प्रयास किया है। जानकारी के मुताबिक इतिहासकार एवं पुरातत्वविद देव बनर्जी शास्त्री ने इस गांव का सर्वेक्षण 1929 में किया था। यहां एक टीला है, जिससे ग्रामीण गढ़ कहते हैं। गढ़ से पाल कालीन मूर्तियां मिली थीं। इसके विस्तृत क्षेत्र को देखते हुए इसकी तुलना नालंदा से की गई थी।

मिल सकती है पाल कालीन इतिहास की जानकारी

जानकारों का कहना है कि केउर गढ़ की खुदाई की जाए तो पाल कालीन इतिहास की काफी जानकारी मिल सकती है। यहां गढ़ की विशेषता है कि यह पक्की ईंटों की है। आज तक पक्के ईंटों वाले गढ़ अपने आप में एक अबूझ पहेली है। गांव की गलियों, खेतों और बधार में बिखरी मूर्तियों की संख्या काफी कम हो गई है।

ग्रामीण अपने स्तर से मूर्तियों को कर रहे संरक्षित

ग्रामीणों ने बताया कि काफी संख्या में प्राचीनमूर्तियों की चोरी हो चुकी है तथा शेष बची मूर्तियां को बचाने के ख्याल से उन्हें इकट्ठा कर सीमेंट से जमा दिया गया है। गांव के दक्षिणी छोर पर बधार में स्थित लगभग 5 फुट ऊंची बिल्कुल काले पत्थर की अग्नि देव की मूर्ति है जो खुले आसमान के नीचे है। उसकी पूजा ग्रामीणों द्वारा विशेष रूप से की जाती है। ग्रामीण स्थानीय तौर पर मुगरदैय देवता के रूप में मानते हैं। इतिहासकारों की ओर से उसे अग्नि देवता कहा गया है। गांव के उत्तर में पक्के ईंटों वाले गढ़ तथा बगल में स्थित 11 शिवलिंग को एक विशेष ज्यामितीय आकार में स्थापित किया गया है जो भी अपने आप में अनूठा है। ग्रामीणों के अनुसार दो वर्ष पूर्व गांव में पानी टंकी निर्माण के लिए खुदाई के क्रम में एक बेहद खूबसूरत मूर्ति मिली है, जिसे चोरों के डर से गांव के ही एक पुरोहित के घर में रखा गया है। ग्रामीणों ने बताया कि जब भी कहीं खुदाई गांव में होती है निश्चित रूप से कुछ ऐतिहासिक चीजें निकलती हैं।

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