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साइकिल योजना ने बिहार प्रदेश की बेटियों में जगाया आत्मविश्वास, जानें कैसे हुई शुरुआत

नीतीश कुमार ने 2005 में नये इरादों के साथ मुख्यमंत्री बने थे। उन्होंने सामाजिक-आर्थिक बदलाव के लिए शिक्षा को माध्यम बनाया। लड़कियों की पढ़ाई की दारुण दशा को सुधारने का फैसला लिया गया। 2006 में सरकार ने एक महत्वाकांक्षी घोषणा की। सरकारी स्कूल की कक्षा नौ में पढ़ने वाली लड़कियों को साइकिल खरीदने के लिए पैसा देने का प्रावधान किया गया। इस योजना को नाम दिया गया, मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना। हर छात्रा को साइकिल खरीदने के लिए दो हजार रुपये मिलते थे। बिहार सरकार ने 2007-08 के बजट में इस योजना के लिए विशेष प्रावधान किए। बिहार नये बदलाव के दरवाजे पर खड़ा था। 2007-08 के बजट ने बिहार में बालिका शिक्षा की युगांतकारी नींव रखी थी। ख़बरों के मुताबिक, 2007-08 में सरकार ने 1 लाख 63 हजार छात्राओं को साइकिल खरीदने पर 32 करोड़ 60 लाख रुपये खर्च किए थे। इस योजना से लड़कियों का हौसला बढ़ा। 2008-09 के दौरान हाईस्कूल में पढ़ने वाली लड़कियों की संख्या बढ़ गयी। इस अवधि में 2 लाख 72 हजार लड़कियों की साइकिल खरीद पर सरकार ने 54 करोड़ 43 लाख रुपये खर्च किये। 2009-10 वित्तीय वर्ष में लाभ लेने वाली लड़कियों की संख्या 4 लाख 36 हजार पहुंच गयी। इनकी साइकिल खरीद के लिए 87 करोड़ 33 लाख रुपये व्यय किये गये। 2021 में बालक/बालिका साइकिल योजना के लिए 458 करोड़ 69 लाख रुपये जारी किये गये थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है 2007-08 में शुरू हुआ सफर कहां से कहां पहुंच गया हैं।

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साइकिल योजना ने बिहार की बालिका शिक्षा को एक नयी उड़ान दी। सपनों की ये उड़ान इस लिए खास थी कि क्योंकि इसके पहले हालात बहुत खराब थे। 2001 में बिहार की महिला साक्षरता दर 33.6 प्रतिशत थी। जब कि राष्ट्रीय औसत 54.2 प्रतिशत था। 2001 में केरल में महिला साक्षरता दर 87.9 प्रतिशत थी। यानी महिला साक्षरता के मामले में बिहार बहुत पिछड़ा हुआ था। अशिक्षा के अंधेरे से निकलने के लिए बिहार कसमसा रहा था। 2006 में नयी शुरुआत हुई। 2006 तक स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों की संख्या 25 लाख थी। लेकिन साइकिल योजना लागू होने के बाद उनकी संख्या घट कर 10 लाख पर पहुंच गयी। इस ऐतिहासिक बदलाव की गूंज विदेश तक पहुंच गयी।

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मिली जानकारी के अनुसार, इंटरनेशनल ग्रोथ सेंटर एक शोध केन्द्र है जो लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में स्थापित है और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की भागीदारी से संचालित है। इस संस्था ने इकोनॉमिक्स के असिस्टेंट प्रोफेसर नीतीश प्रकाश और एसोसिएट प्रोफेसर कार्तिक मुरलीधरन का एक शोध प्रकाशित किया था। यह शोध अप्रैल 2013 से जून 2013 के बीच किया गया था। इस शोध में उस डाटा का इस्तेमाल किया गया था जो घर-घर जा कर इकट्ठा किया गया था।  इस शोध में बताया गया था कि साइकिल योजना सफल रही थी। इसके लागू होने से हाईस्कूलों में लड़कियों की संख्या बढ़ी थी। लड़कियों को साइकिल मिलने से उनका हाईस्कूल आना-जाना आसान हो गया था। उनके नामांकन में करीब 30 फीसदी का इजाफा हुआ था। इसकी वजह से हाईस्कूल में छात्र और छात्राओं की संख्या के बीच का अंतर 40 फीसदी कम हो गया था।

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इसका योजना का श्रीगणेश हुआ था 2007-08 के बजट से। यह जानना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को साइकिल योजना शुरू करने का ख्याल कैसे सूझा था। बता दें,. 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद वे एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे। यह कार्यक्रम पटना जिले के ग्रामीण इलाके में आयोजित था। इस कार्यक्रम में अनुसूचित जाति की एक सौ छात्राओं को सरकार की तरफ से मुफ्त साइकिल दी गयी थी। जब एक सौ छात्राएं एक कतार में साइकिल लेकर जाने लगीं तो एक सुंदर दृश्य उपस्थित हो गया। इस दृश्य को देख कर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मंत्रमुग्ध हो गये थे। उन्होंने कार्यक्रम में मौजूद जिलाधिकारी से इसके बारे में पूछा। जिलाधिकारी ने बताया कि इन छात्राओं को समविकास योजना के तहत साइकिल दी गयी है। मुख्यमंत्री को ये बात पसंद आयी। उनके दिमाग में एक नया विचार कौंधा। उन्होंने अधिकारियों और विशेषज्ञों से इस साइकिल योजना को बड़े पैमाने पर लागू करने के बारे विचार विमर्श किया। राय-विचार के बाद 2006 में मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना लागू कर दी गयी। 

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