श्रावणी मेला 2024: विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला अध्यात्म का केन्द्र ही नहीं है, बल्कि यहां रोजगार का सृजन भी हो रहा है। मेले में सुल्तानगंज और आसपास के 20 हजार से अधिक लोगों को रोजगार भी मिला है। मधेपुरा, सुपौल और सहरसा के बांस से शिवभक्तों का कांवर सज रहा है। कहीं कांवर तो कहीं जलपात्र तैयार करने में कारीगर दिन-रात जुटे हुए हैं। कांवरियों के लिए देश के विभिन्न शहरों से पूजन सामग्री मंगायी गयी है। कांवर पर पवित्र गंगाजल लाकर भक्त भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं।



श्रावणी मेला में हर साल औसतन 50 लाख कांवरियां सुल्तानगंज से जल लेकर बाबा नगरी जाते हैं। बताया जा रहा है कि मेला में 15 लाख से अधिक कांवर की बिक्री होती है। जिसे स्थानीय स्तर पर बनाया जाता है। सुल्तानगंज के शाहाबाद में एक दर्जन से अधिक जगहों पर और मसदी में कारीगरों द्वारा कांवर तैयार किया जा रहा है। दो महीने से कारीगर कांवर तैयार करने में लगे हैं।


शाहाबाद के कृष्ण मुरारी कांवर थोक विक्रेता ने बताया कि मधेपुरा, सुपौल और सहरसा के अलावा बिहपुर के बांस से कांवर तैयार किया जा रहा है। यहां के बांस से बने कांवर में चमक अधिक होती है। तैयार कांवर को दो-तीन साल रखने के बाद भी खराबी नहीं आती है।



श्रावणी मेला में जलपात्र की मांग अधिक है। एक महीने में एक करोड़ से अधिक जलपात्र की बिक्री होती है। आमतौर पर एक कांवरिया तीन जलपात्र लेकर जाते हैं। इसके थोक विक्रेता मो. शकील ने बताया कि सुल्तानगंज में मशीन द्वारा 15 से अधिक जगहों पर प्लास्टिक का जलपात्र तैयार किया जा रहा है। इसमें लोटा और पवित्री शामिल हैं। सबसे अधिक बिक्री पवित्री की होती है। कांवर लेकर नहीं जाने वाले कांवरिया पीठ में पवित्री में गंगा जल लेकर जाते हैं। इसका मटेरियल कोलकाता और पटना से मंगाया जाता है। करीब 25 प्रतिशत जलपात्र पूर्णिया से बनकर आता है। बड़ी मशीन की कीमत अधिक है। उसके रहने पर अधिक जलपात्र तैयार किया जा सकता है।












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