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महाकवि राकेश स्मृति समिति और नवसंचेतन के संयुक्त तत्वावधान में उत्तर छायावाद के अग्रणी कवि राम इकबाल सिंह राकेश की जयंती पर स्मृति पर्व आयोजित

मुजफ्फरपुर के आमगोला स्थित शुभानंदी के सभागार में महाकवि राकेश स्मृति समिति और नवसंचेतन के संयुक्त तत्वावधान में उत्तर छायावाद के अग्रणी कवि राम इकबाल सिंह राकेश की जयंती के अवसर पर स्मृति पर्व का आयोजन किया गया। विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ संजय पंकज ने कहा कि अपने यौवन काल में कवि राकेश उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में रहते हुए साहित्य लेखन के साथ ही कई पत्रिकाओं का संपादन किया।

इनकी रचनाओं में जीवन के व्यापक संदर्भ मिलते हैं जिसमें भारतीय संस्कृति, चिंतन, जन संवेदना और लोक आस्था के मूल्यवान तत्व समाहित हैं। इनकी कविताएं शौर्य, पराक्रम, ओज, विद्रोह और स्वाभिमान के प्रखर स्वर के बीच अंतश्चेतना की उड़ान तथा जीवन सत्य का भी निदर्शन है। डॉ पंकज ने व्यक्तित्व-कृतित्व पर विस्तार से बोलते हुए कहा कि लोक जीवन और जनचेतना के बड़े कवि थे राकेश। इनकी कविताओं में गांव की प्रकृति और उसका वैभव अपने स्वाभाविक रूप तथा व्यापक सौंदर्य में प्रकट हुआ है। गद्य साहित्य में भी इनका अमूल्य योगदान है।

लोक संस्कृति और उसका साहित्य इनका प्रिय विषय रहा। भाषा और शिल्प के स्तर पर सुसंस्कृत और अभिव्यक्ति के स्तर पर प्रगतिशील कविवर राकेश ने महाकाव्यात्मक औदात्य से भरी कई लंबी रचनाओं का सृजन किया। मैथिली लोकगीत उनके विशिष्ट संग्रह हैं। गांव की मिट्टी, उसकी प्रकृति और सामाजिकता इनकी रचनाधर्मिता में सहज ही देखने योग्य हैं। चट्टान, गांडीव, मेघ दुंदुभी, गंध ज्वार, पद्मरागा जैसे काव्य संग्रह इनकी काव्य वास्तु और शिल्प विशेषता को उजागर करते हैं। फसलों और चिड़ियों की संवेदना समझने तथा अनुभूत करने वाले महाकवि राकेश के आध्यात्मिक भाव जन संघर्ष को लेकर चलते हैं।

अध्यक्षीय उद्गार में डॉ ब्रजभूषण मिश्र ने कहा कि राकेश जी कृषि संस्कार के समृद्ध रचनाकार हैं। उनकी कविताओं में किसान के जीवन संघर्ष और उसके जीवन को दर्शाने के साथ ही कृषि कार्य की सघनता को भी प्रमुखता से स्थान दिया गया है। डॉ विजय शंकर मिश्र ने कहा कि राकेश जी की कविताओं में जीवन, समाज, प्रकृति और समय के विविध रंग दिखते हैं। उनकी कृतियों में कविता का सार्वदेशिक और सार्वकालिक सौंदर्य पाठक को चमत्कृत और प्रभावित करता है। जैसे लमही की माटी ने प्रेमचंद दिया उसी तरह भदई की सोंधी सोंधी माटी ने राम इकबाल सिंह राकेश दिया जिनकी रचनाएं युग युगांतर तक अपनी पहचान और गुणवत्ता से प्रभावित करती रहेंगी। राकेश जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के बाद उनके जामाता ब्रजभूषण शर्मा ने अपने स्वागत संबोधन में कहा कि राकेश जी ने मेरी ही गोद में अंतिम सांस ली थी और उन्होंने साहित्य को बचाने के लिए नई पीढ़ी से निरंतर संवाद करने के लिए प्रेरित किया था। उनके कारण मैंने उस समय के अनेक बड़े-बड़े साहित्यकारों के दर्शन किए और उनका स्नेह मुझे मिला। वयोश्रेष्ठ समाजसेवी एच एल गुप्ता ने कहा कि राकेश जी को देखने का मुझे सौभाग्य मिला था। वे सीधे-साधे मगर निर्भीक और दो टूक बोलने वाले थे। साहित्य और लोक के प्रति उनकी गहरी निष्ठा थी। महाकवि राकेश पर पीएचडी शोध करने वाले डॉ केशव किशोर कनक ने कहा कि राकेश जी की कविताओं में जो जीवन मूल्य हैं उसे देखते हुए हम उन्हें मानवतावादी दृष्टिकोण के बड़े कवि के रूप में मानते हैं। उनके व्यक्तित्व में जो अक्खड़पन है वह उन्हें कबीर की चेतना के पास ले जाता है। उनकी वैचारिकता तुलसी के लोकमंगल भाव से संपोषित हैं। राकेश जी की भाषा सुसंस्कृत, परिमार्जित और व्याकरण सम्मत उच्चकोटि की भाषा है। कवयित्री सविता राज ने कहा कि राकेश जी की कविताएं हमें अच्छी भाषा और भावनात्मक अभिव्यक्ति के लिए प्रेरित करती हैं। उनके रचनात्मक अवदानों को भुलाया नहीं जा सकता है। उनकी कृतियां साहित्य की धरोहर हैं। आयोजन में मधुमंगल ठाकुर, प्रेमभूषण, प्रवीण कुमार मिश्र, प्रमोद आजाद, विभु कुमारी, सत्या कुमारी, राकेश कुमार सिंह, माला कुमारी, चैतन्य चेतन, अनुराग आनंद ने भी अपने विचार प्रकट किए। दूसरे सत्र में राकेश जी की कई कविताओं के प्रभावशाली पाठ के बाद उपस्थित कवियों ने भी अपनी रचनाएं प्रस्तुत की। संचालन सुकृति सिंह तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रमोद आजाद ने किया।

दूसरे सत्र में कविगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए विजय शंकर मिश्र ने सस्वर सुनाया- मां का मतलब पूछ रहे हो, मां तो केवल मां होती है – तो मां का होना अर्थित होकर पूरे वातावरण में फैल गया। प्रवीण कुमार मिश्र ने बज्जिका के साथ ही हिंदी गीत- मेरा जीवन मधुर हुआ, तुम आए पावस रीत में – गूंजते रहे। सविता राज की गजल का शेर – महकते फूल दामन में रहेंगे, तभी तो एक आंगन में रहेंगे परिवार और समाज की एकता का संदेश दे गया। संजय पंकज ने कई गीत, गजल, दोहे सुनाए जिसमें गीत की पंक्तियां – तुमसे चलकर तुम तक आना, जीने का बस एक बहाना, सोते जगते तुमको भजना, सांस सांस तुमको गाना है, जीवन का कौन ठिकाना है – जीवन की निष्ठा और नश्वरता को उजागर कर गई। अन्य काव्यपाठ करने वालों में केशव किशोर कनक, राहुल कुमार, यशवंत, प्रणव चौधरी प्रभावशाली रहे। धन्यवाद ज्ञापन चैतन्य चेतन ने किया।

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