कठपुतली संवाद का आयोजन मालीघाट में सरला श्रीवास सामाजिक सांस्कृतिक शोध संस्थान के संयोजक कठपुतली कलाकार सुनील कुमार के अध्यक्षता में किया गया। सुनील कुमार ने बताया की विश्व कठपुतली दिवस 21 मार्च को मनाया जाता है। यह विचार ईरान के कठपुतली थिएटर कलाकार जावद ज़ोल्फ़ागरी का था। 2000 में मैगडेबर्ग में यूनियन इंटरनेशनेल डे ला मैरियोनेट ( यूएनआईएमए ) के 18वें कांग्रेस में, उन्होंने चर्चा के लिए यह प्रस्ताव रखा था।

सरला श्रीवास सामाजिक सांस्कृतिक शोध संस्थान की संरक्षक कांता देवी ने बताया कि माता पार्वती के प्रसन्नता हेतु देवों के देव महादेव ने काष्ठ के मूर्ति में प्रवेश कर कठपुतली कला की शुरुआत की थी। लोक गायिका अनिता कुमारी ने बताया कि भारत कठपुतली की मातृभूमि होने के बावजूद भी हमारे देश के लोगों को इस अद्भुत कला के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं हैं और न ही नई पीढ़ी पिछले कई वर्षों में कठपुतली को देखा हो। वक़्त के साथ कठपुतली कला में काफ़ी बदलाव हुए।पिछले पचास से अधिक वर्षों में भारत में नए प्रकार के कठपुतली का खेल/पुतुल खेल और पुतुल रंगमंच के नए कलाकार सामने आए हैं।



रचनात्मकता और सरलता का जश्न मनाती “कठपुतली एक समृद्ध और विविध इतिहास वाली एक कला है जो बच्चों और वयस्कों दोनों को पसंद आती है।” “यह प्रदर्शनी परिवारों के लिए शैक्षिक, व्यावहारिक अवसर प्रदान करते हुए उस इतिहास का जश्न मनाती है। अनिल कुमार ठाकुर ने बताया कि कठपुतली के जरिये बच्चों में सर्जनात्मकता का विकास होता है. उनमें जानने की रुचि पैदा होती है।पुतलियों के निर्माण तथा उनके माध्यम से विचारों के संप्रेषण में बच्चों को आनंद मिलता है, बच्चों के व्यक्तित्व के चहुँमुखी विकास में सहायक होता है।



इस अवसर पर मुख्य रूप से स्वेता कुमारी,शिव कुमार, गोलू कुमार,चंदेश्वर राम,महेश्वर पासवान,खुशबू कुमारी, आदित्य सुमन, विवेकानंद उर्फ नंदू,कमलेश कुमार, दीपू कुमार, बबिता ठाकुर मौजूद थे। धन्यवाद ज्ञापन सरला श्रीवास युवा मंडल की अध्यक्ष सुमन कुमारी ने दिया और बताया कि सरला श्रीवास की पुण्यतिथि 21 मार्च को विश्व कठपुतली दिवस के रूप में मनाया जाएगा।














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