मुजफ्फरपुर: मुजफ्फरपुर जिस बात के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है वह है लीची। इसीलिए इसे लीचीलैंड भी कहा जाता है। पर, यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि लीची के इस शहर में शास्त्रों-पुराणों में वर्णित दुर्लभ देववृक्ष कल्पवृक्ष भी है। जी हां, वही कल्पवृक्ष जिसके बारे में मान्यता है कि इससे जो मांगो वह मिल जाता है। इसे कल्पतरू, कल्पद्रुप, सुरतरु देवतरु तथा कल्पलता इत्यादि नामों से भी जाना जाता है।

दुर्लभ है पुष्प का दर्शन
मुजफ्फरपुर के एलएस कॉलेज में है दुर्लभ कल्पवृक्ष। कॉलेज के विद्यार्थी रहे तत्कालीन डीजीपी डीपी ओझा ने कॉलेज परिसर स्थित राजेंद्र पार्क में 35 साल पहले इसे लगाया था। इन दिनों इस पेड़ पर दुर्लभ फूल खिला है। दशकों में कभी कभार किसी को दिखायी देने वाला यह फूल करीब 35 वर्ष पुराने कल्पवृक्ष में खिला है। पौराणिक कथा के अनुसार देव-दानव युद्ध के दौरान हुए समुद्रमंथन से प्राप्त 14 रत्नों में कल्पवृक्ष भी एक था। यह इंद्र को दे दिया गया था और इंद्र ने इसकी स्थापना सुरकानन में कर दी थी। कहा जाता है कि कल्पवृक्ष के सामने खड़े होकर जो भी कामना की जाए वह पूरी हो जाती है।

पुराणों में मिलता है वर्णन
पुराणों में कल्पवृक्ष से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। जैसे, समुद्र मंथन के समय समुद्र से 14 रत्न निकले थे, जिसमें से एक रत्न था, कल्पवृक्ष। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा की इच्छा को पूरा करने के लिए इस कल्पवृक्ष को धरती पर लाए थे। यह भी कहा जाता है कि कल्पवृक्ष, भगवान कृष्ण का ही अवतार है, तो कोई कहता है कि जब जीवन की उत्पत्ति हुई तो सबसे पहले कल्पवृक्ष ही धरती पर आया। साथ ही यह माना जाता है कि पृथ्वी के अंत के बाद भी इसका अस्तत्वि रहेगा।
सेवा से संतान की प्राप्ति
एलएस कॉलेज स्थित कल्पवृक्ष के बारे में कहा जाता है कि इस पार्क के माली हरेंद्र कुमार (45) को कोई संतान नहीं था। हरेंद्र का कहना है कि इस पेड़ की सेवा करते-करते उसे संतान की प्राप्ति हुई। यह दुर्लभ संयोग है कि वह गुरुवार को एलएस कॉलेज के 125 वें वर्ष समारोह के लिए पार्क स्थित पेड़ों की छंटाई कर रहा था, तभी कल्पवृक्ष से फूल उस पर आ गिरा। यहां पांच साल से कार्यरत माली ने बताया कि कल्पवृक्ष का फूल अति दुर्लभ है यह जल्दी किसी को दिखाई नहीं देता।

दुनिया में सीमित है कल्पवृक्षों की संख्या
एलएस कॉलेज के प्राचार्य ओपी राय बताते हैं कि कल्पवृक्षों की संख्या दुनिया में सीमित है। इसका एक वृक्ष बिहार विधानसभा के शताब्दी वर्ष पर प्रधानमंत्री ने विधानसभा परिसर में भी लगाया है। एलएस कॉलेज परिसर में लोगों की मनोकामना पूरी करने के उद्देश्य से इसका पौधा 35 साल पहले लगाया गया था। कॉलेज के 125वें वर्ष में प्रवेश के समय इस दुर्लभ फूल का मिलना संयोग मात्र नहीं, मुजफ्फरपुरवासियों के कल्याण का संकेत भी है।
परोपकारी वृक्ष है कल्पतरू
वश्वि स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार हमारे शरीर में आवश्यक 8 अमीनो एसिड में से छह इस वृक्ष में पाए जाते हैं। यह एक परोपकारी वृक्ष है। इसमें संतरे से 6 गुना ज्यादा विटामिन ह्यसी’ होता है। गाय के दूध से दोगुना कैल्शियम होता है। इस वृक्ष की 3 से 5 पत्तियों का सेवन करने से हमारे दैनिक पोषण की जरूरत पूरी हो जाती है। यह कब्ज और एसिडिटी में सबसे कारगर है। इसके पत्तों में एलर्जी, दमा, मलेरिया को समाप्त करने की शक्ति है। यह कीट-पतंगों को फटकने नहीं देता और दूर-दूर तक वायु के प्रदूषण को समाप्त कर देता है।








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