मुजफ्फरपुर: बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के सकरा प्रखंड के जगदीशपुर बनवारी गांव में स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय अपने-आप में अनोखा स्कूल है, क्योंकि स्कूल में सिर्फ 9 बच्चों का एडमिशन है. 60 साल पुराने इस स्कूल में वैसे तो पढ़ाई पहली कक्षा से लेकर पांचवीं तक की होती है लेकिन 5 क्लास को मिलाकर भी बच्चों की संख्या दहाई तक नहीं पहुंच पाती.

9 बच्चों वाला स्कूल
हालांकि बच्चों की संख्या भले ही कम है लेकिन शिक्षकों और अन्य स्टाफ की संख्या पर्याप्त है. स्कूल की प्रधानाध्यापिका बताती हैं कि हमलोगों की कोशिश बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की है. इसलिए हमारे स्तर से किसी प्रकार की कोई कोताही नहीं बरती जाती है. मिड डे मील से लेकर साफ-सफाई तक पूरा ख्याल रखा जाता है.
60 साल पुराना है स्कूल
इस प्राथमिक विद्यालय की स्थापना वर्ष 1966 में हुई थी. स्कूल में कक्षा एक से पांचवीं तक की पढ़ाई होती है. बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रधानाध्यापिका के अलावे दो शिक्षिकाएं और एक शिक्षक तैनात हैं. वहीं, मध्याह्न भोजन के लिए दो कर्मी काम कर रहे हैं.

किस क्लास में कितने बच्चे?
प्रधानाध्यापिका कुमारी मीनू विश्वकर्मा बताती हैं कि स्कूल में कुल 9 बच्चे हैं और सभी बच्चे रोज स्कूल आते हैं. उन्होंने बताया कि पहली कक्षा में दो बच्चों का एडमिशन है, जबकि दूसरी क्लास में तीन बच्चे पढ़ते हैं. तीसरी में एक और चौथी कक्षा में दो बच्चों का नामांकन है. वहीं पांचवीं कक्षा में सिर्फ एक बच्चे का एडमिशन है. वे कहती हैं कि सभी नौ बच्चे रोजाना स्कूल आते हैं और उनको पाठ्यक्रम के हिसाब से सभी विषय पढ़ाई जाती है.

क्यों कम है बच्चों की संख्या?
इस सवाल पर प्रधानाध्यापिका कहती हैं कि यह इलाका पलायन प्रभावित है. अधिकतर परिजन काम के लिए बाहर रहते हैं और अपने बच्चों की पढ़ाई भी वहीं कराते हैं. इसी वजह से स्कूल में बच्चों की संख्या कम है. हमलोग बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए अपने स्तर से प्रयास कर रहे हैं. उम्मीद करते हैं कि आने वाले समय में संख्या जरूर बढ़ेगी.
10 परिवार का ही है टोला
वहीं, स्कूल में कई सालों से पढ़ा रहीं इसी गांव की शिक्षिका प्रमीता कुमारी कहती हैं कि यह स्कूल वार्ड नंबर चार में स्थित है, जहां करीब दस परिवारों का छोटा टोला है. सिर्फ इसी टोले के बच्चे इस विद्यालय में पढ़ने आते हैं. वे बताती हैं कि पास के घनी आबादी वाले इलाके में पहले से एक दूसरा स्कूल है. इसलिए वहां के बच्चे उसी स्कूल में नामांकित हैं. वैसे हमलोग बीच-बीच में टोला में जाकर बच्चों की संख्या को बढ़ाने के लिए प्रयास करते रहते हैं.

मैन्यू के हिसाब से मिड डे मील
मिड डे मील के तहत विद्यालय में प्रतिदिन बच्चों के लिए भोजन तैयार किया जाता है. प्रधानाध्यापिका बताती हैं कि मैन्यू के अनुसार ही खाना बनता है. चालव-दाल और सब्जी के अलावे अलग-अलग दिन के हिसाब से अन्य व्यंजन भी बच्चों को दिए जाते हैं.
एमडीएम पर कितना खर्च?
स्कूल में रोजाना बच्चों के लिए एक किलो चावल पकता है. उसी अनुपात में दाल और सब्जी तैयार की जाती है. इस तरह पूरे महीने में मध्याह्न भोजन पर करीब 1500 रुपये का खर्च आता है. प्रधानाध्यापिका कुमारी मीनू का दावा है कि बच्चों की संख्या भले ही कम हो लेकिन स्कूल की गतिविधियां नियमित रूप से संचालित की जाती हैं.

ग्रामीणों ने जताई चिंता
स्कूल में बच्चों की कम संख्या से स्थानीय लोग भी चिंतित हैं. हालांकि उनका भी यही कहना है कि जिस जगह यह स्कूल है, वहां के ज्यादातर लोग अपने परिवार और बच्चों के साथ बाहर (अन्य प्रदेश या शहर) रहते हैं.










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