आम तौर पर्यावरण से जुड़े आयोजनों की चर्चा होती है तो सहज ही पौधरोपण, जल संरक्षण, वायु गुणवत्ता व इस तरह की अन्य बातें सामने आती हैं, पर इससे इतर इस बार बिहार में पांच जून को अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस का आयोजन प्रकृति संवाद पर केंद्रित होगा। मुंशी प्रेमचंद के गोदान के बाद हिंदी साहित्य के सर्वाधिक चर्चित उपन्यास मैला आंचल के रचयिता फणिश्वर नाथ रेणु की इस वर्ष जन्म शताब्दी है। मैला आंचल के लिए रेणु को पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। उनकी रचनाओं में प्रकृति संवाद बड़े स्तर पर है।
पर्यावरण को साहित्य से जोड़ने की कवायद
बिहार सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने तय किया है कि अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस के मौके पर इस बार रेणु की रचनाओं में प्रकृति चित्रण को मुख्य विषय बनाया जाएगा। साहित्य को पर्यावरण से जोडऩे की यह अनोखी कवायद होगी।
रेणु वाटिका विकसित करने की तैयारी
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की यह भी तैयारी है कि रेणु की स्मृति में एक रेणु वाटिका को विकसित किया जाए। उनके जन्म स्थान औराही हिंगना का भी इस सिलसिले में भ्रमण किया जाएगा। जगह मिली तो वहीं बनेगी रेणु वाटिका। जगह नहीं मिलने पर किसी अन्य स्थल पर विकसित किया जाएगा।
दिन में चर्चा और शाम में नाट्य मंचन
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव दीपक सिंह का कहना है कि रेणु के जन्मशताब्दी वर्ष को ध्यान में रखकर इस अनोखे आयोजन के बारे में सोचा गया है। पांच जून को अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस है। आयोजन की पहली कड़ी में उस दिन सुबह रेणु की उन रचनाओं पर चर्चा होगी जिसमें प्रकृति के साथ जबर्दस्त संवाद है।
रेणु की रचनाओं पर केंद्रित नाटकों का होगा मंचन
इस चर्चा में उन लोगों को आमंत्रित किया जा रहा है जिन्होंने रेणु के साहित्य को करीब से देखा है। उनके करीबी लोगों को आमंत्रित किया जाएगा। आयोजन पटना में होगा। इसी दिन रेणुु की रचनाओं पर केंद्रित दो ऐसे नाटकों का मंचन किया जाएगा जो प्रकृति के साथ संवाद को दर्शाती हैं। इनमें वट बाबा और रसप्रिया के बारे में सोचा जा रहा।
अररिया जिले में हुआ था रेणु का जन्म
रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को अररिया जिले के फारबिसगंज के पास औराही हिंगना में हुआ था। उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं मैला आंचल, परती परीकथा, दीर्घतपा, कितने चौराहे और कलंक मुक्ति। उनकी कृति पर तीसरी कसम नाम से फिल्म भी बन चुकी है। उनके कहानी संग्रह ठुमरी, अग्निखोर, आदिम रात्रि की महक व एक श्रावणी दोपहरी की धूप खूब पढ़ी जाती है। संस्मरण वन तुलसी की गंध, ऋण जल व श्रुत अश्रुत पर्व भी अमर कृतियों में है।











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