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सिस्टम के आगे हारी एक मां: थाने से लेकर आईजी दफ्तर तक लगाई चक्कर, बेटे की मौ’त के तीन माह बाद ज’हर खाकर की खु’दकुशी

जिले के लहेरियासराय क्षेत्र से एक झकझोर देने वाली खबर सामने आई है, जहां एक मां ने सिस्टम से हारकर मौत को गले लगा लिया। भटियारीसराय की रहने वाली मनीषा नामक महिला ने जहरीला पदार्थ खाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। परिजनों का आरोप है कि वह अपने इकलौते बेटे की संदिग्ध मौत के मामले में न्याय के लिए दर-दर भटक रही थी, लेकिन स्कूल प्रबंधन और प्रशासन की उदासीनता ने उसे आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर कर दिया।

तीन महीने पहले हुई थी इकलौते बेटे की मौत

मामले की पृष्ठभूमि तीन महीने पुरानी है। मनीषा का इकलौता बेटा कश्यप लहेरियासराय स्थित ‘माउंट समर स्कूल’ में पढ़ता था। तीन माह पूर्व हॉस्टल के बाथरूम में कश्यप का शव फंदे से लटका हुआ मिला था। उस वक्त भी परिजनों ने स्कूल प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए थे। बेटे को खोने के बाद मनीषा पूरी तरह टूट चुकी थी और उसकी मौत के पीछे की सच्चाई जानने के लिए लगातार अधिकारियों के चक्कर काट रही थी।

रविवार को बिगड़ी थी तबीयत, इलाज के दौरान मौत

मृतक महिला के भाई शिवशंकर कुमार ने बताया कि रविवार शाम करीब छह बजे मनीषा की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी और उसे बार-बार उल्टियां होने लगीं। आनन-फानन में उसे स्थानीय अस्पताल ले जाया गया। जब उसे होश आया, तो उसने बताया कि उसने ‘सल्फाइड’ (सल्फास) की गोलियां खा ली हैं। स्थिति गंभीर देखते हुए उसे तत्काल DMCH रेफर किया गया, जहां मंगलवार की सुबह उपचार के दौरान उसने दम तोड़ दिया।

सिस्टम और स्कूल प्रबंधन पर ‘मैनेज’ करने का आरोप

परिजनों का आरोप है कि मनीषा ने न्याय के लिए थाने से लेकर डीएसपी, एसपी और आईजी तक गुहार लगाई थी, लेकिन स्कूल संचालक के रसूख के आगे उसकी एक न सुनी गई। भाई का कहना है कि स्कूल प्रबंधन ने सभी को ‘मैनेज’ कर रखा था, जिसके कारण आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसी लाचारी और बेटे को खोने के गम ने मनीषा को मौत के रास्ते पर धकेल दिया।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और प्रशासन पर सवाल

इस घटना के बाद मोहल्ले में भारी तनाव और आक्रोश का माहौल है। परिजनों से मिलने पहुंचे वीआईपी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष उमेश सहनी ने सरकार और प्रशासन को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि यदि पुलिस प्रशासन ने समय रहते निष्पक्ष जांच की होती और स्कूल पर कार्रवाई की होती, तो आज मनीषा जीवित होती। यह घटना बिहार की न्याय व्यवस्था और गरीबों की सुनवाई न होने की कड़वी सच्चाई को उजागर करती है।

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