मुजफ्फरपुर: विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान एवं विद्या भारती बिहार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित क्षेत्रीय आचार्य स्थायित्व प्रशिक्षण वर्ग के तीसरे दिन के चारों शैक्षणिक सत्र भारतीय शिक्षा दर्शन, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020, तैत्तिरीय उपनिषद के पंचकोश एवं पंचपदी सिद्धांत तथा शैक्षिक नेतृत्व एवं शिक्षकों के व्यावसायिक विकास जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों पर केंद्रित रहे। दिनभर चले बौद्धिक सत्रों में देश के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों ने भारतीय ज्ञान परंपरा एवं आधुनिक शिक्षा के समन्वय पर अपने विचार रखते हुए आचार्यों का मार्गदर्शन किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ। विभाग निरीक्षक राजेश कुमार रंजन ने सभी मुख्य वक्ताओं का अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानपूर्वक स्वागत किया। प्रशिक्षण वर्ग का प्रभावी एवं गरिमामय संचालन भारती शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, सदातपुर, मुजफ्फरपुर के प्राचार्य डॉ. राकेश कुमार पाल ने किया।

प्रथम सत्र में विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान के क्षेत्रीय संयोजक प्रो. रमन कुमार त्रिवेदी ने “राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 : समग्र एवं बहुविषयक शिक्षा” विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि नई शिक्षा नीति केवल डिग्री प्रदान करने की व्यवस्था नहीं, बल्कि संस्कारित, चरित्रवान, आत्मनिर्भर एवं राष्ट्रनिष्ठ नागरिकों के निर्माण का सशक्त माध्यम है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा, आधुनिक विज्ञान, अनुसंधान, नवाचार तथा बहुविषयक शिक्षा का समन्वय राष्ट्रीय शिक्षा नीति की सबसे बड़ी विशेषता है। शिक्षा मनुष्य के शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और आत्मा के संतुलित विकास का माध्यम है। उन्होंने आचार्यों से सतत अध्ययनशील, शोधोन्मुख, नवाचारी एवं मूल्यनिष्ठ बनने का आह्वान करते हुए कहा कि शिक्षक ही राष्ट्र के भविष्य के निर्माता हैं।
पंचकोश और पंचपदी भारतीय शिक्षा की आत्मा — उमा शंकर पोद्दार
द्वितीय एवं तृतीय सत्र में विद्या भारती के वरिष्ठ शिक्षाविद उमा शंकर पोद्दार ने “छात्रों के समग्र विकास और अध्यापक शिक्षा में पंचकोश की भूमिका” तथा “तैत्तिरीय उपनिषद में वर्णित पंचपदी एवं शिक्षा में उसका अनुप्रयोग” विषय पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि तैत्तिरीय उपनिषद के अनुसार मनुष्य अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय—इन पाँच कोषों का समन्वित स्वरूप है। इसलिए शिक्षा केवल बौद्धिक विकास तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि उसका उद्देश्य शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक विकास सुनिश्चित करना है।
उन्होंने विद्या भारती की पंचपदी शिक्षण पद्धति—अधीति, बोध, अभ्यास, प्रयोग एवं प्रसार की विस्तार से व्याख्या करते हुए कहा कि यह पद्धति शिक्षण को जीवनोपयोगी एवं अनुभवपरक बनाती है। इससे विद्यार्थियों में ज्ञान के साथ संस्कार, विवेक, आत्मविश्वास, सामाजिक उत्तरदायित्व एवं नेतृत्व क्षमता का विकास होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की समग्र शिक्षा की अवधारणा का मूल आधार भारतीय ज्ञान परंपरा और उपनिषदों में निहित है।
प्रभावी नेतृत्व और सतत व्यावसायिक विकास से ही बनेगा उत्कृष्ट शिक्षक — डॉ. शंकर परिपल्ली
दिन के चतुर्थ एवं अंतिम सत्र में राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन संस्थान (NIEPA), नई दिल्ली के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शंकर परिपल्ली ने “शैक्षिक नेतृत्व एवं शिक्षकों का व्यावसायिक विकास” विषय पर प्रेरक व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षक की भूमिका केवल कक्षा शिक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे एक प्रभावी शैक्षिक नेता, नवाचारी चिंतक, मार्गदर्शक और आजीवन सीखने वाले शिक्षार्थी के रूप में विकसित होना होगा। उन्होंने शिक्षकों से डिजिटल दक्षता, सतत व्यावसायिक विकास, अनुसंधान, नवाचार, सहयोगात्मक नेतृत्व तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षण पद्धतियों को अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि मूल्याधारित, सहभागितापूर्ण और दूरदर्शी नेतृत्व ही उत्कृष्ट शिक्षण संस्थानों की पहचान बन सकता है।
भारतीय शिक्षा दर्शन और आधुनिक शिक्षा का प्रभावी समन्वय
दिनभर चले चारों सत्रों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के प्रभावी क्रियान्वयन, भारतीय ज्ञान परंपरा, पंचकोश, पंचपदी, समग्र शिक्षा, शैक्षिक नेतृत्व तथा शिक्षक के सतत व्यावसायिक विकास जैसे विषयों पर गहन मंथन हुआ। प्रतिभागी आचार्यों ने अपने-अपने संस्थानों में इन अवधारणाओं को व्यवहारिक रूप से लागू कर विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए कार्य करने का संकल्प व्यक्त किया।
प्रशिक्षण वर्ग के दौरान विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान के अध्यक्ष रजनीश कुमार गुप्ता, सहसचिव डॉ. ललित किशोर, विभाग निरीक्षक राजेश कुमार रंजन सहित अनेक वरिष्ठ पदाधिकारी एवं शिक्षाविद सभी सत्रों में उपस्थित रहकर प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन करते रहे।
अंत में विभाग निरीक्षक राजेश कुमार रंजन ने सभी वक्ताओं, प्रतिभागियों एवं आयोजन समिति के प्रति आभार व्यक्त किया। समूह चर्चा, अनुभव साझा करने तथा “वंदे मातरम्” के सामूहिक गायन के साथ प्रशिक्षण वर्ग के तीसरे दिन के सत्रों का गरिमापूर्ण एवं सफल समापन हुआ।









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