मुजफ्फरपुर: सूरज कुमार सिंह, फहद जमा, शाहनवाज़ हुसैन उर्फ नौशाद, मोहम्मद आरिफ लंबे समय तक भाकपा (माले) की राजनीति और जनसंघर्षों से जुड़े रहे है। पार्टी के सिद्धांतों, गरीबों-मजदूरों-किसानों के अधिकारों और सामाजिक न्याय की लड़ाई के प्रति प्रतिबद्धता के साथ कार्य किया। लेकिन गहरे आत्ममंथन और गंभीर राजनीतिक मतभेदों के बाद आज भाकपा (माले) की प्राथमिक सदस्यता तथा पार्टी के सभी दायित्वों से इस्तीफा देने की घोषणा की है।

यह निर्णय किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का परिणाम नहीं है, बल्कि तीन बुनियादी राजनीतिक और संगठनात्मक सवालों से जुड़ा हुआ है।
- लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की अनदेखी और जनवादी केंद्रीकरण का विकृत प्रयोग
हाल के बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया लगभग निष्प्रभावी कर दी गई। बिहार राज्य कमिटी को केवल निर्णय लागू करने वाली इकाई बना दिया गया, जबकि अधिकांश महत्वपूर्ण निर्णय पोलित ब्यूरो स्तर पर लिए गए। जिला कमिटियों की राय और स्थानीय अनुभवों की उपेक्षा की गई।

चुनाव में 20 सीटों पर लड़ने के बावजूद पार्टी केवल 2 सीटें जीत सकी। लेकिन चुनावी रणनीति तय करने वाले शीर्ष नेतृत्व की जवाबदेही तय करने के बजाय राज्य कमिटी को जिम्मेदार ठहराया गया। जब पार्टी मंचों पर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और सामूहिक निर्णय प्रणाली पर सवाल उठाए, तो संवाद और बहस की जगह पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।

- मुसलमानों की राजनीतिक भागीदारी के प्रश्न पर अवसरवादी चुप्पी
महागठबंधन ने बिहार के लगभग 17 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं से वोट तो मांगा, लेकिन उन्हें सम्मानजनक राजनीतिक भागीदारी देने के प्रश्न पर गंभीरता नहीं दिखाई।चुनाव के दौरान कई मुस्लिम नेताओं के टिकट काटे गए। राजद ने अपने प्रमुख मुस्लिम नेतृत्व को प्रभावी ढंग से सामने नहीं रखा। इसी दौरान वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी द्वारा यह बयान दिया गया कि “यह कोई सिनेमा का टिकट नहीं है जो मुसलमानों को दे दें।” इस बयान की न तो महागठबंधन के अन्य दलों ने और न ही भाकपा (माले) ने स्पष्ट और सार्वजनिक आलोचना की।

भाजपा जहां खुले तौर पर सांप्रदायिक राजनीति करती है, वहीं स्वयं को धर्मनिरपेक्ष कहने वाली पार्टियां यदि मुसलमानों को केवल वोट बैंक के रूप में देखें और उनकी राजनीतिक भागीदारी के सवाल पर मौन रहें, तो यह भी लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
- गरीबों और भूमिहीनों के संघर्ष से दूरी
मुजफ्फरपुर शहर स्थित महाराजी पोखर के भिंडा पर बसे 123 भूमिहीन गरीब परिवारों को हटाने के लिए जब पुलिस बल और जेसीबी मशीनों के साथ प्रशासन पहुंचा, तब पार्टी नेतृत्व बैठकों में व्यस्त रहा। संघर्ष की उस घड़ी में गरीबों के बीच पार्टी की उपस्थिति नहीं दिखी। इस घटना ने गरीबों और भूमिहीन परिवारों के बीच गहरी निराशा पैदा की। एक ऐसी पार्टी, जो खुद को गरीबों की आवाज बताती है, उससे अपेक्षा थी कि वह सबसे पहले संघर्षस्थल पर खड़ी दिखाई देती।

- संकल्प
“मैं आज भी सामाजिक न्याय, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और गरीब-शोषित तबकों के अधिकारों की राजनीति में विश्वास करता हूँ। पार्टी छोड़ना इन मूल्यों को छोड़ना नहीं है। मेरा संघर्ष जारी रहेगा और मैं जनता के सवालों को उठाने के लिए प्रतिबद्ध रहूँगा। मैं उन सभी साथियों का आभार व्यक्त करता हूँ जिन्होंने वर्षों तक संघर्ष के रास्ते पर मेरा साथ दिया। साथ ही, मैं लोकतांत्रिक बहस और आत्मालोचना की संस्कृति को मजबूत करने की अपील करता हूँ, क्योंकि बिना लोकतंत्र के कोई भी जनपक्षधर राजनीति टिकाऊ नहीं हो सकती।”
इन लोगों के अलावा पार्टी छोड़ने वालो में प्रमुख थे वैशाली जिला के महुआ के राजू वारसी,मोहम्मद ताजु, मोहम्मद सफी, लक्ष्मण राय ,राशिद, संजय शाह, जियालाल शाह, कमलेश कुमार, फैजान, नन्द किशोर, प्रेम कुमार, ने भी पार्टी की सदस्य्ता से इस्तीफा दिया।












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