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नहाय-खाय के साथ आस्था का महापर्व चैती छठ आज से शुरू, जय छठी मईया…

लोक आस्था के महापर्व छठ का चार दिवसीय अनुष्ठान शनिवार को नहाय-खाय के साथ शुरू हो जाएगा। इस दिन छठ व्रती सुबह स्नान कर भगवान का ध्यान करेंगे। स्नान व पूजा के बाद व्रती अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू की सब्जी को प्रसाद के रूप में ग्रहण करेंगे। नहाय-खाय के दूसरे दिन रविवार को व्रती दिनभर उपवास रहने के बाद शाम में स्नान कर भगवान भाष्कर का ध्यान करेंगे। रोटी और गुड़ से बनी खीर का प्रसाद तैयार कर सूर्य देव और छठी मईया को अर्पित करेंगे। उसके बाद वे स्वयं प्रसाद के रूप में खीर और रोटी ग्रहण करेंगे। इस पूजा को ‘खरना’ कहा जाता है। अगले दिन चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को उपवास रखकर व्रतियां शाम को बांस से बने दउरा में ठेकुआ, फल, ईख समेत अन्य प्रसाद लेकर नदी, तालाब या अन्य जलाशयों में जाकर डूबते सूर्य को अ‌र्घ्य देंगे। अगले दिन यानी सप्तमी तिथि की सुबह उदयीमान सूर्य को अ‌र्घ्य देने के बाद व्रत पूर्ण होगा।

इस बार घाट पर नहीं जाएंगे व्रती : इस बार कोरोना वायरस के चलते देशव्यापी लॉकडाउन को देखते हुए व्रती घाट पर नहीं जाएंगे। घर की छतों अथवा आंगन में बने कृत्रिम घाट पर ही यह पर्व मनाया जाएगा। फल व पूजा सामग्री की खरीदारी में भी लोगों को काफी मुश्किलें हो रही हैं। कई जगह भटकने के बाद किसी तरह लोग सामान खरीद रहे हैं।

पर्व का इतिहास : ब्रह्मापुरा स्थित बाबा सर्वेश्वरनाथ मंदिर के आचार्य संतोष तिवारी बताते हैं कि इस पर्व को स्त्री और पुरुष दोनों समान रूप से मनाते हैं। छठ महापर्व के विषय में पौराणिक मान्यता है कि रामायण अथवा महाभारत काल में ही छठ पूजा का आरम्भ हो चुका था। एक मान्यता यह भी है कि सर्वप्रथम महाभारत काल में सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यदेव का पूजन किया था, जिसके बाद से यह परंपरा चल पड़ी।

पंडित या पुरोहित की जरूरत नहीं : उमेश नगर, जीरोमाइल के नीरज बाबू बताते हैं कि लोक आस्था के इस महापर्व का हिंदू धर्म में अलग महत्व है। यही एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमें ना केवल उदयीमान सूर्य की पूजा की जाती है बल्कि अस्ताचलगामी सूर्य को भी पूजा जाता है। सांझ और सुबह के इन दोनों अघ्र्यो के पीछे एक आस्था काम करती है। वो ये कि सूर्यदेव की दो पत्नियां हैं – ऊषा और प्रत्युषा। सुबह की सूर्य की किरण ऊषा होती है और सांझ की प्रत्युषा। इसलिए सुबह और शाम दोनों समय अ‌र्घ्य देने का उद्देश्य सूर्यदेव की दोनों पत्नियों का अर्चना-वंदन होता है। पर्व में न तो किसी पुरोहित या पंडित की जरूरत पड़ती है और न ही किसी दिखावे की। इस पर्व का उल्लेख अथर्वेद में भी मिलता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी इस पर्व को करने से कई लाभ मिलता है। मान्यता है कि सच्चे मन से छठ पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। इसे करने वाली स्त्रिया धन-धान्य, पति, पुत्र तथा सुख-समृद्वि से परिपूर्ण रहती हैं।

पवित्रता का रखते ख्याल : हरिसभा चौक स्थित राधाकृष्ण मंदिर के पुजारी पं.रवि झा बताते हैं कि इस चार दिवसीय पर्व में पवित्रता का खास ख्याल रखा जाता है। इसकी शुरूआत ‘नहाय खाय’ से होता है। इसके बाद खरना, फिर सांझ का अ‌र्घ्य और अंत में भोर के अ‌र्घ्य के साथ पर्व संपन्न होता है। यूं तो यह पर्व चार दिनों का होता है, परन्तु षष्ठी और सप्तमी तिथि के अ‌र्घ्य का विशेष महत्व माना जाता है।

 

Source: Jagran

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