मुजफ्फरपुर: राष्ट्रकवि की अमर कृति रश्मिरथी के लेखन एवं प्रकाशन की हीरक जयंती के अवसर पर हनुमान नगर, माड़ीपुर स्थित पार्वती सदन में “दिनकर की रश्मिरथी : एक संवाद” विषयक साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन डॉ. अशोक शर्मा की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में साहित्यकारों, शिक्षाविदों एवं बुद्धिजीवियों ने रश्मिरथी के साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पक्षों पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत किया।

मुख्य वक्ता ने अपने उद्बोधन में कहा कि राष्ट्रकवि दिनकर केवल राष्ट्रीय चेतना के कवि नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय समरसता के भी अप्रतिम रचनाकार हैं। उन्होंने कहा कि रश्मिरथी जाति और सत्ता के पाखंड को चुनौती देने वाला ऐसा कालजयी खंडकाव्य है, जो वैश्विक मनुष्यता, समानता और लोकमूल्यों की प्रतिष्ठा करता है। महाभारत के महायोद्धा कर्ण के व्यक्तित्व के माध्यम से दिनकर ने सिद्ध किया कि महानता जन्म या वंश से नहीं, बल्कि मनुष्य के कर्म, चरित्र और आचरण से निर्धारित होती है।
डॉ. पंकज ने कहा कि रश्मिरथी वीरता की गाथा, सामाजिक न्याय का उद्घोष, जातिवाद के विरुद्ध सशक्त प्रहार तथा भारतीय सांस्कृतिक चेतना का जीवंत दस्तावेज है। भाव, भाषा और विचार की दृष्टि से यह कृति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी अपने प्रकाशन के समय थी। उन्होंने बताया कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर स्मृति न्यास, दिल्ली के तत्वावधान में देशभर में रश्मिरथी पर्व का आयोजन किया जा रहा है।
उन्होंने आगे कहा कि दिनकर ने व्यक्ति के आंतरिक गुणों और मानवीय मूल्यों को सर्वोच्च स्थान देते हुए समाज को जोड़ने का कार्य किया। उन्होंने कहा कि रश्मिरथी में किसी पात्र को खलनायक नहीं बनाया गया, बल्कि कर्ण के विराट और उदात्त चरित्र को मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रतिष्ठित किया गया है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि देश को प्रथम राष्ट्रपति और राष्ट्रकवि देने का गौरव मुजफ्फरपुर को प्राप्त है। उन्होंने स्मरण कराया कि दिनकर ने रश्मिरथी का लेखन एवं प्रकाशन मुजफ्फरपुर में ही किया था और इसके प्रकाशन के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर इस कालजयी कृति पर व्यापक राष्ट्रीय संवाद की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि दिनकर आज भी जन-जन के कवि हैं। उनकी पंक्तियाँ समाज के प्रत्येक वर्ग में उद्धृत होती हैं। उन्होंने कहा कि चूँकि दिनकर में हिंदी के प्राध्यापक रहे, इसलिए मुजफ्फरपुर का दायित्व है कि उनके साहित्य को नई पीढ़ी तक प्रभावी ढंग से पहुँचाया जाए। दिनकर की अनेक पंक्तियाँ जनजीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। उन्होंने प्रसिद्ध पंक्ति “जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है” का उल्लेख करते हुए कहा कि आज यह जानकर प्रसन्नता हुई कि यह रश्मिरथी की अमर पंक्ति है। इस अवसर पर डॉ. संजय पंकज ने रश्मिरथी के अनेक अंशों का सस्वर पाठ भी किया।
अंत में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए उन्होंने कहा कि अनेक राष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत राष्ट्रकवि दिनकर का रचनात्मक व्यक्तित्व वैश्विक चेतना का प्रतीक है। रश्मिरथी आज भी बुद्धिजीवियों से लेकर आमजन तक समान रूप से लोकप्रिय है और अपनी अमर पंक्तियों के माध्यम से भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति में जीवंत बनी हुई है।








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